
ज़िन्दगी में कभी लगे
कि ज़िन्दा रहने का अब कोइ मक्सद ही नहीं,
बेहाल तंगहाल साँसों को खिंच पाना अब और मुमकीन भी नहीं,
दुनिया के सारे ग़म मानो तुम्हारे कमरे ही टिमटिमा रहे हो,
और बक्से में पडी नींद की गोलीयाँ ही बस आखिरी सहारा हो,
तो जाते-जाते,
इस भले मानस की एक बात ज़रुर मानना,
उन गोलियों से पहले,
कुछ देर के लिए ही सही,
किसी सरकारी आस्पताल के बाहार जा बैठना ।
वहाँ, जहाँ ज़िन्दगी को मौत ने घेरा है
पर फिर भी,
हर चौखट पर उम्मीदों का डेरा है ।
कुछ सुनना,
कुछ देखना,
और हो सके तो कुछ समझना ।
कुछ ऐसे मिलेंगे,
जिन्हें पता है अपने आखिरी साँसों का हिसाब ।
कुछ वैसे,
जिन्हें बस हिम्मत का सहारा है ।
और कुछ वे भी,
जिनके तन पर कुछ नहीं
पर मन हारता ही नहीं ।
हर एक की कहानी में कुछ एक से है रंग
हर कहानी में कुछ पन्ने है बेरंग ।
वे भूखे-नंगे-थके-हारे
बस उन पन्नों को ताकते रहते हैं,
दवा-दारु न सही
वो कहानीकार कहीं तो है।
कुछ और पन्नों मे वो रंग ज़रुर फूंक देगा,
“द एन्ड” को कुछ और पन्नों के पीछे धकेल देगा ।
और एक तुम हो,
जो अपनी कहानी से ही डर रहे हो,
उस कहानी के बिना ही “द एन्ड” कह रहे हो ।
माना कुछ पन्नों पर खुशीयों का मौसम ज़रुर मंदा है,
पर उम्मीदों की छोटी-बडी़ पोटली के सहारे ही तो हम सब ज़िन्दा है।
दिल अब भी समझ ना पाया हो तो,
गोलियाँ बक्से में ही कर रही है तुम्हारा इंतज़ार,
पर उन गोलियों से पहले,
किसी सरकारी आस्पताल के चौखट पर बैठ आना एक बार।



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