डायरी

अपनी कहानी,  कुछ रुहानी                                 
थोडी रुमानी,  बाकी नफसानी ।

अपनी बातें,  कुछ शिकायतें
थोडी आयतें,  बाकी कुफर् की बातें ।

अपनी ज़िन्दगी,  कुछ बन्दगी
थोडी संजीदगी,  बाकी आवरगी ।

अब तक है बस इतना
चंद लफ्जों में सब सिमटा ।

किसको पता है
कल के माथे
क्या लिखा है ?
कल की तरह
वो कल भी तो पोशीदा है
हम रहे ना रहे
ज़िन्दगी बस जाविदा है ।

 (Hmm…cant get over it ! every thing that m writing, its becoming me, myself n more of me. like this recent post. during school n college days, used to write diary regularly. recently discovered that i still have that old diary. going thru those old pages is always great fun. wondering what all i have done, why n where n how? good, bad, ugly everything. some secrets n some not so secrets. hav tried to put all those pages in this post. )

Published in: on जून 20, 2007 at 4:19 अपराह्न  टिप्पणियाँ (9s)  

स्थायी पता

कुछ नई दीवारें                                               
एक नई छत
कुछ नई खिड़कीयाँ
उस साइज के नए परदे ।

साथ मे कुछ नए कपड़े
एक जोडी़ नई चप्पल
कुछ नए
कुछ पुराने यार-दोस्त ।

ज़िन्दगी की मियाद यहां बस ग्यारह महीने की
फिर एक नया पता
इस शहर में जब से आया हुँ
“स्थायी पता”  के आगे जगह खाली छोड़ देता हुँ ।

 ( waise abhi abhi naye makaan me shift hua hoon. picchle 41/2 saloon me mumbai me panchwa pata. aur har post ki tarah, isme bhi shayad dheroon spelling mistakes hain. maaf  kare. angrezi keyboard par hindi typing me kabhi ye nahi hota, kabhi woh nahi hota. nukta idhar ki jagah udhar pahunch jata hai. saath hi bahut kuch ab samjah me bhi nahi aata. lambe arse ke baad hindi me likhna shuru kiya hai. warna ab tak to roman ke bharose hi tha. aur hindi me school tak marks to acche hi aate they. phir shayad budha ho raha hoon)

Published in: on जून 14, 2007 at 11:20 पूर्वाह्न  टिप्पणियाँ (14s)  

कुछ और लकीरें

एक बात चली
तो कई बात टली
जब तुमने कही
सब हमने सुनी
कब सुबह हुई
कब शाम ढली
सब भूल गया
जब दिल की चली ।

———————————————————–

कसकर बाँधा था उसे
लोहे के बक्से मे डाला था
उसपर बडा़ सा ताला जड़ दिया
और चाबी भी गुम कर दी ।
सोचा था,
आज नहीं तो कल
दम तोड ही देगी ।
बडा़ बेवकूफ बना मैं
वो मरना कहां जानती है
बात-बात पर बाहर निकल आती है
कभी डायरी के इस पन्ने से
कभी एलबम के उस पन्ने से
या
यूं ही कभी तन्हाई मे साथ देने को ।
परेशानी बस इतनी है
नए रिश्तों से खुब कतराती है ।
इन पुरानी यादों का कोइ इलाज़ है क्या ?

Published in: on मई 18, 2007 at 4:47 अपराह्न  टिप्पणियाँ (16s)  

लकीरें

मरने के बहाने कई है
एक जीने का बहाना भी तो हो
उल्फत के किस्से खुब सुने
अब मुकम्मल अपना फसाना भी तो हो ।

———————————————-

हाथों में रखे हाथ
बस उंगलियों से हो रही थी बात
बुढ़ा नाखुनवाला अंगुठा
कुछ शर्मा रहा था
सोचा तो बहुत था
कुछ कह नहीं पा रहा था ।

एक अरसे बाद,
आज फिर उसे है देखा
कुछ बदली सी है वो
या
बदली है किस्मत की रेखा
या
धोखा है इन करों का
नाआशना है जो अब भी
ये काम तो था फ़कत बुढी़ आखों का कभी ।

——————————————–

उन ख्वाबों को
अब हां कह दिया
जिनसे दिल बडा डरता था
उन राहों पे
अब चल पडा
एक रहनुमा जो संग मिल गया ।

Published in: on मई 7, 2007 at 9:55 अपराह्न  टिप्पणियाँ (7s)  

शराब

मैं शराब नहीं पीता । ऐसे  में यार दोस्तों की महफिल में मेरे होने या ना होने से ज्यादा फर्क नहीं पडता । मिल बैठने की बात हो तो सब एक राग अलापते हैं – यार तू तो पीता भी नहीं है । क्या करेंगे मिल बैठकर ? 

कुछ समय से मैंने कोला पीना भी बंद कर दिया है । वरना पहले वो शराब लेते तो मैं कोला के ग्लास को लेकर चीयर्स कहता ।  हमेशा इस कोशिश में  भी जुटा रहता हुँ की कुछ दोस्त जैसे-तैसे मेरे गुट में शामिल हो जाए । पर अब तक सब नाकाम । साथ ही कवियों और शायरों ने शराब को जिस तरह से “romanticise” किया है वहाँ मेरी क्या चलेगी । पर अजीब बात ये है कि हर शराबी के तर्क लगभग एक से हैं । मेरी कुछ नाकामयाब कोशिशें॰॰॰॰॰॰॰

पहला पेग़….

मैं : इतनी ज़ल्दी मरने का इरादा क्यों है ? क्या करोगे इतनी शराब पी कर ?
वो : तुम क्या करोगे इतनी लम्बी ज़िन्दगी जी कर ?

दूसरा पेग़…..

मैं : ये escapist attitude है । तुम ज़िन्दगी से भाग रहे हो ।
वो : तुम भी तो ज़िन्दगी मे भाग ही रहे हो । कहीं पहुँच भी रहे हो ?

तीसरा पेग़…..

मैं : खुशी में दारु, ग़म में दारु।   कुछ काम बन जाए तो दारु , काम न बने तो दारु , बहुत ज़्यादा काम हो तो दारु , कुछ काम न हो तो भी दारु । तुम्हें बस पीने का एक बहाना चाहिए ।
वो : तुम भी तो जीने का बस एक बहाना ही ढुंढ रहे हो । मिल जाए तो बता देना ।

मैं : यूं घुट-घुटकर मरने का क्या फायदा ?
वो : यूं घुट-घुटकर जीने का क्या है फलसफा ?

चौथा पेग़……

मैं : अपनी नहीं तो घरवालों की सोचो । उन्हें पता चलेगा तो कितना दुखी होंगे ।
वो : दुखी तो मैं भी हुँ । कम से कम ये तो नहीं पता है उन्हें । वरना और दुखी होगें ।

 नई बोतल……

मैं : अब बस भी करो । आज बहुत पी चुके तुम ।
वो : तुम girlfriend  मत बनो । यार तुम दोस्त हो दोस्त ही रहो ।

आपके पास कोइ और तर्क है क्या ?

 

Published in: on अप्रैल 6, 2007 at 12:33 अपराह्न  टिप्पणियाँ (7s)  

एक कोशिश और

बस जीवन का दो कश लगा
और खुद को ढारस आप बँधा,
नाकाम हुआ तू, तो क्या शर्म यहाँ,
एक हाथ थाम, एक हाथ बढा़ ।

यह स्वर्ग है, यही नरक है
बस नाम मात्र का फर्क है
गाहे-बगाहे के बाकी तर्क है
जो चमक गया वो अर्क है
जो फिसल गया वो गर्क है
फिसल पडा़ तू, तो क्या शर्म यहाँ 
एक हाथ थाम, एक हाथ बढा़
जीवन का बस दो कश लगा
और खुद को ढारस आप बँधा ।

हर दिल यहाँ मुश्ताक है
हर मोढ पर कुछ अवसाद है
और कुछ समय समय की बात है
जो चल पडा़ वो उस्ताद है
जो थक गया वो नाशाद है
थक गया तू, तो क्या शर्म यहाँ
एक हाथ थाम, एक हाथ बढा़
बस जीवन का दो कश लगा
और खुद को ढारस आप बँधा ।

क्या धर्म है, क्या अधर्म है
ज़ीवन के अनसुलझे कई मर्म है
जब रोम-रोम तेरा पुलकित हो
बस वही तो सच्चा कर्म है
जो लोग कहे कुछ, कहने दे
रुसवाई से क्या शर्म यहाँ
एक हाथ थाम, एक हाथ बढा़
बस जीवन का दो कश लगा
और खुद को ढारस आप बँधा । 

( hope its not sounding like too much of lecturebaazi. what say ? ) 

Published in: on फ़रवरी 28, 2007 at 12:39 अपराह्न  टिप्पणियाँ (9s)  

सवाल

Things must have changed now, i guess.  when i grew up, we were made to believe that there are only three career choices, which gives money n respect. Doctor(d), engineer(e) and IAS(i). sucess = d/e/i. everything else is failure. there is a sanskrit shlok that i read in school and still remember some bit of it…..madhyama dhanam ch manam icchanti……means middle class wants both money and fame. the other lines of the sholka translates to…..upper class wants only fame and lower class wants only money.  but middle class wants both. the logic of fame n money came from there, i guess. 

i grew up in dhanbad, a non-metro city known for its coal mines. my parents never told me what to do and what not, as far as my life was concerned. they always supported me in my decision. but somehow the social structure was such that i also realised sooner or later that there r only three options in life.  i was good in painting. used to make potraits of shammi narang, salama sultan n others….those popular faces who used to read news during DD days. when they would read news, i would paint their potrait by watching them on tv. my parents wanted me to take painting classes as well. i resisted. how can someone be only painter ? i want suceess (= d,e or i). never wanted to be a failure. engineering sounded mechanical. so, i decided to be doctor or ias. something that will affect people’s life as well. doctor – i could not crack the entrance. ias was next thing. but not anymore. figured out the rackets of life very soon. ended up being a journalist after doing mass comm course. no regrets.  sucess is highly overrated. its all about what u want in life. the way u feel happy. good will hunting

 

met an old school friend recently. he is doing MD. both of us have changed a lot. different profession. different life. discovered recently that still we r in the same business somehow. read on……

आजकल किस रौ में जीए जाते हो,
हर सवाल का जवाब ‘शायद’ ही ‘शायद’ कहे जाते हो
शब्दों की मुफलीसी के शिकार तो ना थे तुम,
या किसी के उल्फत में हो गए हो गुमसुम ।
रोजी रोटी की कसीस
रिश्तों में नहीं है अब वो तपीश
दुनिया से यूं ही कुछ खलिश
या जीने का कोई फलसफा ही नहीं ?
शायद हाँ
शायद नहीं
शायद पता नहीं
शायद सोचा ही नहीं।

बचपन का एक पुराना यार मिला,
बस सवालों का सिलसिला चल पडा ।
वो डॉक्तर बन गया है
और मैं पत्रकार ।
एक अरसे बाद मिल बैठे हम यार
दिल खोलकार कुछ बातें हुई चार।
ज़िन्दगी ने दोनों को बडा़ बदल दिया था
बस तनिक बातें, एक सी कर गया था ।

कौन, कैसे, किसका, कहाँ, क्यों और कब,
इन्हीं सवालों का जवाब ढुंढ रहे थे हम अब ।
वो भी,
और मैं भी ।
वो अस्पताल मे, मरीजों के संग
मैं बाहार, देख रहा था सर्कस का हर रंग ।
उसके सवाल कुछ ज़िन्दगी ज़रुर बदल रहे थे
मेरे, बस कुछ बदलने का ढोंग रच रहे थे ।

हर रोज़, सुबह शाम
दिन बितता है, बस सवालो के नाम
कुछ रंग-बिरंगे, कुछ श्वेत-श्याम
कुछ सीधे-साधे, कुछ टेढे-मेढे
कुछ सहमे-सहमे
विडम्बना ये की सब बिके हुए,
बडे सस्ते से।
चलते-चलते मैंने उसकी ओर
और उसने मेरी ओर देखा
एक दुजे के कई अनसुलझे सवालों को पढा
और सोचा
क्या ज़मीर अब दुनिया से यूं ही नदारद रह जाएगी ?
कब तक ?

singer-lyricist swanand kirkire gave me some nice feedback on my ramblings. hav been dancing on his head for quite some time for this. said…take out i, me and myself. realised he was right, damn right. everything that i was writing in my mobile sms draft box or putting it here was the same…main hi main. life seen thru the same prism. my prism. have to change this. seriously.

btw, here goes four lines by him….on similar theme….as they say….sau sunhaar ki ek lauhaar ki…i took four thousad lines to say the same n he did it in four lines….ha ha ha….

 

ज़िन्दगी सवालों के जवाब ढुंढने चली
ज़वाब में सवालों की एक लम्बी सी लढी मिली,
सवाल ही सवाल है
कि सुझती नहीं गली
कि आज हाथ थाम लो,  एक हाथ की कमी खली॰॰॰॰॰॰॰॰

Published in: on फ़रवरी 22, 2007 at 5:13 अपराह्न  टिप्पणियाँ (4s)  

तन्हाई

 

तन्हाई ने एक दिन
मुझसे चुपके से यूं कहा,
दिल तुम्हारा आजकल
ऐसे क्यों धडक रहा ?
अपनी धडकनों से तुम कुछ क्यों नहीं कहते,
हंसी-खुशी वो चुपचाप शान्त क्यों नहीं रहते ?
मैं तो अब भी हुँ तुम्हारे साथ
यूँ ही कसकर थामे रखो मेरा हाथ ।

मैं मंद-मंद मुसकाया
आँखें मुंदकर इशारों में ही ये जताया,
सुनी है,
मैंने भी धडकनों की बात,
खफ़ा हैं वे तुमसे आज रात ।
जशन की रात भी तुम देरी से आते हो
उस पर बहाने पे बहाने बनाए जाते हो ।

पता है,
हमें भी मौसम का मिज़ाज़ खुब,
तुम भी धीरे-धीरे बदल रहे हो अपना रंग-रुप ।
सुना है,
तुम्हारे दोस्तों की ज़मात भी बढती ही जा रही
उस फ़हरिस्त में हमारी यारी नीचे ही फिसलती आ रही ।

याद है,
जब शहर में तुम नए-नए थे
एक छत की तलाश में
दिन-भर फिरते रहते थे
थोडा़ हैरान, कुछ परेशान ।
अपने अच्छे-बुरे कई दोस्तों की बातों को अनसुनी कर
बुलावा दिया था तुम्हें एक शाम अपने घर पर।

उस शाम,
अपनी कहानी कहते-कहते ही सो गए थे तुम
अंधेरे में देख ना पाया
कि रात भर इतने रोए थे तुम ।
बात सुबह समझ में आई
जब पाया, की तकिया तब भी गीला पडा़ था ।
हाथ बढा़कर मैंने कहा था
मेरे कमरे में ही क्यों नहीं रह जाते ।
लिखते-पढते,
सुनते-सुनाते,
नए-पुराने कुछ गीत गुनगुनाते
कट जाएगी ज़िन्दगी यूं ही दिन-रात ।

वैसे भी,
मैं भीड़-भाड़, शोर-शराबे से दूर रहता हुँ
अक्सर पार्टीयों में भी बडा़ बोर होता हुँ
सच्ची-सच्ची कहना
क्या तुम दोगे मेरा साथ ?
तो कसकर थाम लूँ मैं आज ही तुम्हारा हाथ ।

एक वो दिन था
और एक आज का दिन है ,
अब तुम स्वार्थी हो गए हो
कुछ को रुलाते हो
कुछ को सताते हो ।
अपने दोस्तों को समझाते क्यों नहीं
तुमसे दोस्ती सबकी फितरत में नहीं ।

और तुम भी
बंगला-गाडी़ के चक्कर में मत पड़ना
खुशी अगर वहाँ होती
तो तुम्हें फिर क्यों कहते लोग अपना ।
अब बस लौट आओ,
आखिरी कुछ सांसों में तो दोगे तुम मेरा साथ,
तुम्हारे संग
शायद यही हो जशन की आखिरी आज रात ।

Published in: on फ़रवरी 19, 2007 at 3:58 अपराह्न  टिप्पणियाँ (7s)  

काश ऐसा होता…..

कुछ ख्वाबों को तकीए पर अकेला छोड आया हुँ,
मुस्कुराते हुए स्वार्थ को बेडीयों में जकड आया हुँ
बंगला गाडी के बुलबुलें यूं ही उडा आया हुँ,
ऐशो आराम की कश्ती भी गंगा में बहा आया हुँ,
आसमानी छत के तले एक फलक ढुंढने आया हुँ ।

बेनाम, बेकश, बेखुदी में गुम हो गया है जो कहीं,
सडकों पर हर पल रेंगती हुई ज़िन्दगी में,
झूठ के साये मे हरी-भरी फूलती-फलती ज़िन्दगी में,
हर सफलता पर अपना नाम थोपने को बेकरार,
हर चौराहे पर हरी बत्ती का इंतज़ार करती हुई ।

कोशिश मैंने भी की,
कुछ उस ज़िन्दगी के रंग-रुप में ढलने की,
थोडे़ दिनों सफल हुआ,
बाद में आदत पड गई खाली हाथ मलने की ।

अब सब कहते है,
फलक ढुंढने का वो अच्छा है बहाना,
हर थके हारे भगोडे की ज़िन्दगी का है ये किस्सा पुराना ।

तुम भी उसी खेत की मूली हो,
ज़िन्दगी से ही भाग रहे हो ।
दिल कहता है ज़िन्दगी से नहीं,
भाग रहा हुँ ज़िन्दगी के संग,
देखना चाहता हुँ उसके कुछ अनछुए रंग ।

तुम्हारी दुनिया तुम्हें भी हो खुब मुबारक,
बस ख्वाबों को ज़रा धीमे भगाना,
क्या पता साँसें कब जाए थक ।
फिर एहसास कुछ ऐसा न हो,
कि ज़िन्दगी के दिन ही पड गए कुछ कम,
बस दो पल की रोटी ही जुटाते रह गए हम ।
घरवालों के लिए, बीवी-बच्चों के लिए, रिश्तेदारों के लिए ।

Published in: on फ़रवरी 9, 2007 at 3:09 अपराह्न  टिप्पणियाँ (6s)  

वो पुरानी सर्दी

 

इस ठिठुरती ठंड में,
मेरा ग़म क्यों नहीं ज़रा जम जाता,
पिघल-पिघल कर बार-बार आखों से क्यों है निकल आता ।

घने से इस कोहरे में,
हाथों से अपने चेहरे को नहीं हुँ ढुँढ पाता,
फिर कैसे उसका चेहरा बार-बार नज़रों के सामने है आ जाता ।

बर्फीली इन रातों में,
अलाव में ज़लकर कई लम्हें धुँआ बनकर है उड़ जाते,
बस कुछ पुरानी यादें राख बनकर है कालिख छोड़ जाते ।

अब दिन इतने है छोटे
की सुबह होते ही शाम चौखट पर नज़र आती है,
शाम से अब डर नहीं लगता,
सर्दी तो वही पुरानी सी है,
पर पहले बस ठंड थी,
अब पुरानी यादें भी दिल को चीर कर जाती है ।

 

Published in: on फ़रवरी 9, 2007 at 10:57 पूर्वाह्न  टिप्पणियाँ (3s)  
Follow

Get every new post delivered to your Inbox.