वो पुरानी सर्दी

 

इस ठिठुरती ठंड में,
मेरा ग़म क्यों नहीं ज़रा जम जाता,
पिघल-पिघल कर बार-बार आखों से क्यों है निकल आता ।

घने से इस कोहरे में,
हाथों से अपने चेहरे को नहीं हुँ ढुँढ पाता,
फिर कैसे उसका चेहरा बार-बार नज़रों के सामने है आ जाता ।

बर्फीली इन रातों में,
अलाव में ज़लकर कई लम्हें धुँआ बनकर है उड़ जाते,
बस कुछ पुरानी यादें राख बनकर है कालिख छोड़ जाते ।

अब दिन इतने है छोटे
की सुबह होते ही शाम चौखट पर नज़र आती है,
शाम से अब डर नहीं लगता,
सर्दी तो वही पुरानी सी है,
पर पहले बस ठंड थी,
अब पुरानी यादें भी दिल को चीर कर जाती है ।

 

Published in: on फ़रवरी 9, 2007 at 10:57 पूर्वाह्न  Comments (3)  

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3 टिप्पणियाँटिप्पणी करे

  1. wallah…………….

  2. Somen this poem has touched a chord in me. Very well written, simple and beautiful words, just the kind to convey the feelings and emotions!!! I am glad I went through you profile.

  3. somen kafi accha laga teri kavitayee pad ke.Keep it up………………


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