कुछ और लकीरें

एक बात चली
तो कई बात टली
जब तुमने कही
सब हमने सुनी
कब सुबह हुई
कब शाम ढली
सब भूल गया
जब दिल की चली ।

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कसकर बाँधा था उसे
लोहे के बक्से मे डाला था
उसपर बडा़ सा ताला जड़ दिया
और चाबी भी गुम कर दी ।
सोचा था,
आज नहीं तो कल
दम तोड ही देगी ।
बडा़ बेवकूफ बना मैं
वो मरना कहां जानती है
बात-बात पर बाहर निकल आती है
कभी डायरी के इस पन्ने से
कभी एलबम के उस पन्ने से
या
यूं ही कभी तन्हाई मे साथ देने को ।
परेशानी बस इतनी है
नए रिश्तों से खुब कतराती है ।
इन पुरानी यादों का कोइ इलाज़ है क्या ?

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Published in: on मई 18, 2007 at 4:47 अपराह्न  Comments (16)  

लकीरें

मरने के बहाने कई है
एक जीने का बहाना भी तो हो
उल्फत के किस्से खुब सुने
अब मुकम्मल अपना फसाना भी तो हो ।

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हाथों में रखे हाथ
बस उंगलियों से हो रही थी बात
बुढ़ा नाखुनवाला अंगुठा
कुछ शर्मा रहा था
सोचा तो बहुत था
कुछ कह नहीं पा रहा था ।

एक अरसे बाद,
आज फिर उसे है देखा
कुछ बदली सी है वो
या
बदली है किस्मत की रेखा
या
धोखा है इन करों का
नाआशना है जो अब भी
ये काम तो था फ़कत बुढी़ आखों का कभी ।

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उन ख्वाबों को
अब हां कह दिया
जिनसे दिल बडा डरता था
उन राहों पे
अब चल पडा
एक रहनुमा जो संग मिल गया ।

Published in: on मई 7, 2007 at 9:55 अपराह्न  Comments (7)