लकीरें

मरने के बहाने कई है
एक जीने का बहाना भी तो हो
उल्फत के किस्से खुब सुने
अब मुकम्मल अपना फसाना भी तो हो ।

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हाथों में रखे हाथ
बस उंगलियों से हो रही थी बात
बुढ़ा नाखुनवाला अंगुठा
कुछ शर्मा रहा था
सोचा तो बहुत था
कुछ कह नहीं पा रहा था ।

एक अरसे बाद,
आज फिर उसे है देखा
कुछ बदली सी है वो
या
बदली है किस्मत की रेखा
या
धोखा है इन करों का
नाआशना है जो अब भी
ये काम तो था फ़कत बुढी़ आखों का कभी ।

——————————————–

उन ख्वाबों को
अब हां कह दिया
जिनसे दिल बडा डरता था
उन राहों पे
अब चल पडा
एक रहनुमा जो संग मिल गया ।

Published in: on मई 7, 2007 at 9:55 अपराह्न  Comments (7)  

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7 टिप्पणियाँटिप्पणी करे

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  2. Koi mil gaya!koi mil gaya!
    kya bataon yaaron,
    main to khil gaya!
    koi mil gaya!!!
    Hey..!Congratulations!!lagta hai,aapki humsafar ki talash poori hone ko hai!!

  3. Written ok. But why are there so many spelling mistakes?

  4. मरने के बहाने कई है
    एक जीने का बहाना भी तो हो
    उल्फत के किस्से खुब सुने
    अब मुकम्मल अपना फसाना भी तो हो ।….

    यह रचना बहुत सुंदर है।:-)

  5. kya khub likha hai🙂

  6. Jindgi ki ajab kahani hai, khushi ho ya gam aa jata hai dono waqt me paani hai

  7. bahut hi utkrisht kavitaye hai sabhi.


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